रील्स के दौर में खोता संवाद

सुबह उठते ही मोबाइल हाथ में आता है। व्हाट्सएप स्टेटस देखते हैं, फेसबुक स्क्रॉल करते हैं, इंस्टाग्राम पर रील्स चलने लगती हैं। कुछ हीमिनटों में हम दर्जनों लोगों की निजी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।किसने क्या खाया, कौन कहाँ घूमने गया, किसने नई कार खरीदी, किसनेकिस बात पर प्रतिक्रिया दी—यह सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनचुका है। दूसरी ओर, हम स्वयं भी अपने जीवन के छोटे-छोटे क्षणों कोतस्वीरों, वीडियो और स्टेटस के रूप में दुनिया के सामने रखने लगे हैं।प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह केवल तकनीक काप्रभाव है या समाज की बदलती मानसिकता का संकेत? सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है। अब विचारव्यक्त करने के लिए किसी समाचारपत्र, टीवी चैनल या बड़े मंच कीआवश्यकता नहीं है। हर व्यक्ति के हाथ में एक ऐसा माध्यम है, जिसकेजरिए वह हजारों-लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। यह आधुनिक संचारव्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। लेकिन इसी उपलब्धि नेएक नई चुनौती भी पैदा की है—संवाद की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। आजव्यक्ति केवल जीना नहीं चाहता, वह अपने जीवन को लगातार दिखाना भीचाहता है। दूसरी ओर, समाज केवल जानकारी प्राप्त नहीं करना चाहता, बल्कि दूसरों के जीवन में झाँकने की एक निरंतर जिज्ञासा भी विकसित होचुकी है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को अभूतपूर्व गति दी है। ‘लाइक’, ‘कॉमेंट’ और ‘शेयर’ अब केवल तकनीकी सुविधाएँ नहीं रह गई हैं, बल्किसामाजिक स्वीकृति के नए प्रतीक बन चुके हैं। मीडिया अध्ययन बताता है कि मनुष्य केवल सूचना का उपभोक्ता नहींहोता, वह सामाजिक मान्यता की भी तलाश करता है। पहले यह मान्यतापरिवार, मित्रों और समाज से मिलती थी, आज उसका बड़ा हिस्साडिजिटल मंचों पर मिलने लगा है। जितने अधिक लाइक, उतनी अधिकलोकप्रियता; जितने अधिक फ़ॉलोअर, उतनी अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा।धीरे-धीरे हमारी डिजिटल पहचान ही हमारी सामाजिक पहचान काविस्तार बनती जा रही है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्णपात्र न तो उपयोगकर्ता है और न ही कंटेंट क्रिएटर, बल्कि वह एल्गोरिदमहै, जो यह तय करता है कि हमें क्या देखना है। हम जिस प्रकार कीसामग्री देखते हैं, उसी प्रकार की सामग्री हमें बार-बार दिखाई जाती है।परिणामस्वरूप हम ऐसे डिजिटल वातावरण में पहुँच जाते हैं जहाँ हमें वहीविचार, वही समाचार और वही दृष्टिकोण अधिक दिखाई देते हैं, जिनसेहम पहले से सहमत होते हैं। इसे ही ‘इको चैंबर’ कहा जाता है। यहीं से लोकतंत्र के सामने नई चुनौती खड़ी होती है। लोकतंत्र केवलचुनावों का नाम नहीं है। लोकतंत्र का आधार नागरिकों के बीच संवाद, असहमति का सम्मान और सार्वजनिक हित के प्रश्नों पर विचार-विमर्श है।जर्मन दार्शनिक युर्गेन हैबरमास ने सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sphere) कीकल्पना ऐसे स्थान के रूप में की थी, जहाँ नागरिक तर्कपूर्ण संवाद केमाध्यम से समाज और लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। उनका मानना थाकि स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहाँ लोग एक-दूसरे को सुनें, तर्क दें औरसमझने का प्रयास करें। लेकिन डिजिटल युग में स्थिति तेजी से बदल रही है। अब सार्वजनिकसंवाद का बड़ा हिस्सा एल्गोरिदम द्वारा नियंत्रित मंचों पर हो रहा है। वहाँहमारी मुलाकात अक्सर उन लोगों से कम होती है, जो हमसे असहमत हों।परिणामस्वरूप संवाद की जगह पुष्टि (Confirmation) और बहस कीजगह प्रतिक्रियाएँ (Reactions) लेने लगती हैं। व्यक्ति धीरे-धीरे यहमानने लगता है कि उसका दृष्टिकोण ही अंतिम सत्य है, क्योंकि उसकेडिजिटल संसार में उसे उसी विचार की बार-बार प्रतिध्वनि सुनाई देती है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में यह स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।यहाँ विभिन्न धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और सामाजिक समूह सदियों सेसाथ रहते आए हैं। इस विविधता को बनाए रखने के लिए संवाद सबसेबड़ी आवश्यकता है। यदि विभिन्न समुदायों के बीच प्रत्यक्ष संवाद कमहोता जाए और उनकी समझ केवल सोशल मीडिया पर प्रसारितसूचनाओं, वायरल वीडियो और भावनात्मक रील्स के आधार पर बननेलगे, तो गलतफहमियाँ और सामाजिक दूरियाँ बढ़ सकती हैं। यह कहनाउचित नहीं होगा कि हर सामाजिक तनाव का कारण सोशल मीडिया है, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया कई बार उनतनावों को तेज़ी से फैलाने और गहरा करने का माध्यम बन जाता है। आज रील्स की दुनिया में जटिल सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों कोतीस या साठ सेकंड में समेट देने की कोशिश होती है। विचारों की जगहदृश्य प्रभाव, तथ्यों की जगह भावनाएँ और तर्क की जगह त्वरितप्रतिक्रियाएँ अधिक प्रभावशाली हो जाती हैं। जो सामग्री सबसे अधिकउत्तेजना पैदा करती है, वही सबसे अधिक वायरल होती है। ऐसे वातावरणमें संवाद का स्थान शोर लेने लगता है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस पूरी व्यवस्था से सबसे अधिक लाभकिसे हो रहा है? पहली दृष्टि में लगता है कि लाभ कंटेंट बनाने वाले कोमिलता है। उसे लोकप्रियता, पहचान और कभी-कभी आर्थिक लाभ भीमिलता है। देखने वाले को मनोरंजन और सूचना प्राप्त होती है। लेकिनयदि व्यापक दृष्टि से देखें तो सबसे बड़ा लाभ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मको होता है। आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सबसे मूल्यवान वस्तुहमारा समय और हमारा ध्यान है। जितनी देर हम स्क्रीन पर रहते हैं, उतनाअधिक लाभ डिजिटल कंपनियों को मिलता है। इसलिए उनका उद्देश्यसंवाद को गहरा बनाना नहीं, बल्कि उपयोगकर्ता को अधिक से अधिकसमय तक प्लेटफ़ॉर्म पर बनाए रखना होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया केवल नकारात्मक है। इसनेअनेक सामाजिक आंदोलनों को नई ऊर्जा दी है, आम नागरिक को आवाज़दी है और ज्ञान तथा सूचना तक पहुँच आसान बनाई है। समस्या तकनीकमें नहीं, बल्कि उसके उपयोग और उसके व्यावसायिक मॉडल में है। आज आवश्यकता सोशल मीडिया से दूरी बनाने की नहीं, बल्कि संवादकी संस्कृति को पुनर्जीवित करने की है। हमें अपने विचारों से भिन्न विचारोंको भी सुनने की आदत विकसित करनी होगी। डिजिटल साक्षरता, तथ्य-जाँच और तर्कपूर्ण बहस को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनानाहोगा। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक केवल बोलते नहीं, बल्कि सुनते भी हैं; केवल प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि समझने का प्रयासभी करते हैं। शायद आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम सोशल मीडिया परकितना समय बिताते हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या हम डिजिटलमाध्यमों का उपयोग संवाद के लिए कर रहे हैं या केवल अपनी हीप्रतिध्वनि सुनने के लिए? यदि हम इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर खोजसकें, तो शायद हम न केवल सोशल मीडिया को बेहतर बना सकेंगे, बल्किअपने लोकतंत्र को भी अधिक संवादशील, सहिष्णु और जीवंत बनापाएँगे।

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