जरा याद उन्हें भी कर लो, जो देश के लिए जीएं

दिल्ली भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के गांधीवादी आंदोलन से 2011 के बाद परिचित हुई। उससे पहले सन 2007 में ही दिल्ली के गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी शम्भू दत्त शर्मा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहीम ‘सत्याग्रह’ के नाम छेड़ी थी। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में गांधीजी का साथ निभाया और ब्रिटिश इंडियन आर्मी की अपनी सुविधाजनक नौकरी को छोड़ा। आजादी से पहले वे अंग्रेजों से लड़ते रहे और आजादी के बाद वे भ्रष्टाचारमुक्त भारत के लिए लड़ते रहे। आजादी के बाद जब देश में आपातकाल लगा, उन्हें जेल में डाल दिया गया था। उनकी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अधूरी है। इसी सवाल पर दिसम्बर 2013 में दिल्ली की सरकार चुनी गई लेकिन उसने भी कोई कारगर कदम नहीं उठाया और दो साल पहले 2016 में शम्भू दत्तजी भ्रष्टाचार मुक्त सपने के साथ हमारे बीच नहीं रहे। आज वे हमारे बीच होते तो अगले महीने 09 सितम्बर को 100 साल के होते।

यह सच है कि स्वतंत्रता के आंदोलन में दिल्ली के योगदान को कम करके आंका गया। दिल्ली में जन्मे पले—बढ़े नवयुवक भी राजधानी के स्वतंत्रता सेनानियों के संबंध कम ही जानते हैं। दिल्ली के छोटे—छोटे गांव से निकले स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के पैरों के नीचे जमीन खिसका दी थी। भाई परमानंद उन्हीं में से एक हैं। दिल्ली के ढक्का गांव की एक कॉलोनी का नाम भाई परमानंद के नाम पर है। जो दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर से भी लगा हुआ है। भाई परमानंद अक्टूबर 1905 में दक्षिण अफ्रिका महात्मा गांधी के साथ गए। वे आर्य समाजी थे। भाई परमानंद गदर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे। ढका गांव के सामाजिक कार्यकर्ता किशन सिंह चौहान के अनुसार उन्होंने गदर पार्टी के लिए एक किताब भी लिखी थी, तारिख ए हिन्द के नाम से। लाहौर कॉन्सपीरेसी मामले में उन्हें 1915 में सजा ए मौत हुई। जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदला गया। उन्हें काले पानी की सजा भी मिली। सजा के दौरान राजनीतिक बंदियों के साथ किए जाने वाले दुव्र्यवहार के खिलाफ 1920 में उन्होंने भूख हड़ताल की। भूख हड़ताल से पड़े दबाव का ही परिणाम था कि अंग्रेजों को उन्हें रिहा करना पड़ा। भाई परमानंद ने अपनी आंखों से देश को आजाद होने के सपने को पूरा होते हुए देखा और आजादी मिलने के चार महीने बाद ही 08 दिसम्बर, 1947 को वे नहीं रहे। ढका गांव और अंग्रेजों से जुड़ा राजपूताना शान को दर्शाने वाला एक किस्सा और है।

सन 1911 में अंग्रेजो का दरबार जब ढका गांव में लगा तो वहां गांव को हटाने की बात हुई। अंग्रेज यहां अपना कन्टोनमेन्ट बनाना चाहते थे। लेकिन राजपूत बहुल गांव होने की वजह से और राजपूतों का दबदबा अंग्रेजों की सेना में भी होने की वजह से वह साहस ना जुटा सके। आजाद भारत में सन 1960 में भारत सरकार ने जरूर ढका गांव की बड़ी जमीन पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के बीच वितरित कर दी।

दिल्ली के छावला गांव में पेशे से अधिवक्ता जयप्रकाश शोकीन की माने तो पहले और दूसरे विश्व युद्ध में गांव से बड़ी संख्या में जवान गए थे। उन कई नामों में दिलीप सिंह के नाम का जयप्रकाश शोकीन विशेष तौर से उल्लेख करते हैं। दिलीप नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की सेना के सिपाही थे। गांव वाले बताते हैं कि उन्होंने अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया है। उनकी गिरफ्तारी जर्मन सेना के हाथों हो गई थी। उनके सैनिकों से खुद को बचाकर वे पूरे छह महीने की पैदल यात्रा करके छावला पहुंचे थे।

देशबंधु गुप्ता के नाम से दिल्ली वाले खूब परिचित होंगे। अजमेरी गेट के पास उनकी मूर्ति लगी हुई है। देशबंधु गुप्ता मार्ग से करोल बाग जाने वाले गुजरते ही हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक महत्वपूर्ण कॉलेज का नाम भी देशबंधु कॉलेज है। इतना सब होने के बावजूद दिल्ली की नई पीढ़ी में यह जानने वाले कम हैं कि रति राम देशबंधु गुप्ता एक महान क्रांतिकारी थे। जिन्होंने देश के लिए कभी अपने प्राणों की परवाह नहीं की। पहली बार 19 साल की उम्र में जेल गए। महिलाओं के बीच जब पहला सार्वजनिक भाषण दिया तो अंग्रेजों ने उनके भाषण पर प्रतिबंध लगा दिया। उसके पश्चात उन्हें संगठन के काम में लगाया गया। वे लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद के निरंतर संपर्क में थे। वे बालगंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित थे। उन्हें दीनबंधु नाम गांधीजी और स्वामी श्रद्धानंद ने दिया था। उन्होंने ‘रोजाना तेज’ के नाम से एक ऊर्दू अखबार भी चलाया। राष्ट्रवादी पत्रकार महान क्रांतिकारी देशबंधु गुप्ता की मृत्यु पर नेहरू ने कहा था— ”आज दिल्ली सुनी हो गई।”

‘इंडियन एम्पायर’ के नाम से मार्टिस की एक किताब है, जिसमें उन्होंने लिखा है— 1857 की क्रांति के बाद जो विद्रोही दिल्ली आए थे, वे संख्या में अधिक नहीं थे लेकिन दिल्ली की जनता ने उनका पूरा साथ दिया। वे दिल्ली के अलग—अलग गांव में बिखरे गुर्जर विद्रोहियों के साथ हुए। 1857 के विद्रोहियों और दिल्ली के गुर्जरों की बगावत आपस में मिलकर अंग्रेजों के लिए बेहद घातक साबित हुई थी। इंडियन एम्पायर के पृष्ठ 32 पर मार्टिस ने लिखा है— इसी वजह से दिल्ली के आस—पास के गांवों में गुर्जरों का दमन अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक क्रूर एवं अमानवीय तरिके से किया गया।”

इस बात का जिक्र गणपति सिंह की किताब ‘1857 के गुर्जर शहीद’ में मिलता है।

वजीराबाद गांव के डॉ राजवीर सिंह प्रधान चन्द्रावल गांव के क्रांतिकारी दयाराम खारी के संबंध में जानकारी देते हैं। चन्द्रावल गांव के युवकों ने दयाराम खारी के नेतृत्व में संगठित होकर दिल्ली के मेटकाफ हाउस जो अंग्रेजों का निवास स्थान था, उस पर अधिकार कर लिया। लूट के दौरान किसी ने भी महिला अथवा बच्चों को ना हाथ लगाया ना ही उनके साथ किसी प्रकार की अभद्रता की। यहां तक की लूट के दौरान एक बड़े अंग्रेज अफसर की पत्नी की अंगूठी उनके साथ आ गई। यह अंगूठी उनकी परम्परा में सुहाग की निशानी थी, ऐसा सोचकर चन्द्रावल गांव के युवाओं के क्रांतिदल का एक समूह अपनी जान पर खेल कर वह अंगूठी लौटा कर आया।

स्वतंत्रता सेनानी दयाराम खारी और उनके युवाओं की टोली पर मेटकाफ हाउस लूटने, वजीराबाद शस्त्रागार लूटने और अंग्रेजों को मौत के घाट उतारने का गम्भीर आरोप था। उसके बाद नरसंहार का दौर शुरू हुआ। उन दिनों गांव के बाहर बड़—पीपल का पेड़ लगाया जाता था। दिल्ली के गांवों के पेड़ों पर प्रतिदिन दो—चार लाशे लटकी हुई मिलती थीं। इन देशभक्तों के शव सड़कर पूरे वायुमंडल को दूषित करते थे लेकिन इनकी अन्त्येष्टी करने का साहस कोई इसलिए नहीं कर पाता था क्योंकि अगले दिन उन्हें भी इनकी हमदर्दी के जुर्म में फांसी पर ना लटका दिया जाए। डॉ राजवीर सिंह प्रधान के अनुसार— ”उन दिनों गुर्जर परिवार की जो बहुएं दिल्ली से बाहर थीं और गर्भवति थीं, उनकी संतानों से वंश परम्परा आगे बढ़ी।”

एक अनुमान के अनुसार सिर्फ चन्द्रावल से 90 के आस—पास स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटका दिया गया। जिनकी लाशों को छकड़ों पर रखवा कर दूर फिकवा दिया जाता था। मतलब उन्हें अंतिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ।

दुख की बात यह है कि दयाराम खारी को दिल्ली के लोग भी नहीं जानते। जिसने मेटकाफ हाउस पर कब्जा किया। सर थॉमस मेटकाफ द्वारा तैयार कराया गया मेटकाफ हाउस सिविल लाइन्स में आज भी विद्यमान है। —एक मेटकाफ हाउस दक्षिणी दिल्ली के महारौली में स्थित है— वह मैगजीन रोड़ भी अपनी जगह पर है, जहां से शस्त्र लूटा गया था। सिर्फ मिटा तो दयाराम खारी का नाम। दिल्ली वाले उन्हें भूल गए। जिसने दिल्ली के लिए अपना सबकुछ खो दिया।

मुंडका गांव जाने पर लगा कि यह पूरा गांव तो क्रांतिकारियों का ही गांव है। यहां के निवासी सत्यनारायण ने सुनाया किस तरह पूरा गांव भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तारी देने को अंग्रेजों के सामने खड़ा हो गया था। गिरफ्तारी हो रही थी। इतने में एक आठ साल का बच्चा भी सामने आ गया। गिरफ्तारी देने को। अंग्रेज इतनी कम उम्र के बच्चे को गिरफ्तार करने के पक्ष में नहीं थे। उनकी आपसी बातचीत चल ही रही थी कि आठ साल के बालक वेदपाल ने अंग्रेज अफसर के मुंह पर थूक दिया और लपक कर उसके कंधे पर चढ़ कर दो चार थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिए। अंग्रेज अफसर कुछ समझ पाते कि वेदपाल ने कहा— ”अब तो गिरफ्तार करेगा इस बच्चे को?” जब वेदपाल की गिरफ्तारी हुई। उसके पीछे ढोल नगाड़े लेकर गांव वाले चले। स्वतंत्रता सेनानी वेदपालजी का पूरा नाम वेदपाल सिंह खोखरा था। आजादी के बाद उनके बुलावे पर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू मुंडका गांव आए थे और यहां आकर उन्होंने वृक्षारोपण किया था।

डॉ भीमराव अम्बेडकर कॉलेज के प्राध्यापक डॉ बीजेन्दर इसी गांव से हैंं। डॉ बीजेन्दर बताते हैं— ”मुंडका गांव चौधरी चन्दगीराम लाकरा जय हिन्द और तूलेराम यादव जैसे क्रांतिकारियों का भी गांव है। देश के लिए इस गांव के लोग कभी जान देने से भी पीछे नहीं हटे।”

स्वतंत्रता सेनानी तूलेराम यादव के बेटे अतर सिंह यादव से बातचीत हुई तो पता चला कि वे अपने पिता की याद में फरवरी महीने के दूसरे या तीसरे रविवार को बड़ा भंडारा करते हैं। उनकी याद में आस पास के कई गांव के लोग जुटते हैं और बड़ा सा मेला लगता है। बकौल अतर सिंह— ”आपने सुना है ना शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, तो तूलेरामजी की याद में इस गांव में हर वर्ष मेला लगता है।”

बहरहाल दिल्ली के स्वतंत्रता सेनानियों की सूचि काफी लंबी है। आप जहां भी हैं, अपने आस—पास पता कीजिए। क्या वहां से कोई स्वतंत्रता सेनानी है। आप उनके संबंध में अपने मित्रों से चर्चा कीजिए। सोशल मीडिया पर लिखिए। यही आपकी तरफ से देश के उन वीर जवानों को सच्ची श्रद्धांजली हो सकती है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दी या मरते दम तक देश के लिए जीए।