JANKI DEVI PATNA जानकी देवी

गणपरास से मिली पहचान

जानकी देवी एक खास किस्म के कीटनाषी की खोजकर्ता हैं। हाल में ही राश्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान की ओर से पंाचवा राश्ट्रीय तृणमूल प्रोद्योगिकी नव प्रवर्तन एवं पारंपरिक ज्ञान पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया। वैसे जानकी खुद को इसका खोजकर्ता नहीं बताती हैं, वह कहती हैं- ‘इस तरह का ज्ञान हमारी प्रकृति में भरा पड़ा है। जरुरत है, उसे समझने और महसूस करने की।’ जानकी अधिक पढ़ी-लिखी नहीं हैं। इसलिए वे कीताबी बातें नहीं करती। उन्होंने सारा ज्ञान अपने अनुभव से हासिल किया है। वह बिहार के बेतिया की रहने वाली हैं।
JANKI DEVI PATNA जानकी देवी
JANKI DEVI |जानकी देवी

जानकी देवी द्वारा तैयार किया गया कीटनाषी बनाना बेहद सरल है। इस कीटनाषी को तैयार करने के लिए कनैल का बीज एक किलो चाहिए, इसके साथ में गणपरास एक किलो। पहले इन दोनों को आपस में अच्छी तरह मिला लें। उसके बाद गणपरास और कनैल के बीज के मिश्रण में पांच लीटर पानी मिलाएं और इसे पांच दिनों के लिए छोड़ दीजिए। पांचवे दिन इसका पानी निकाल कर खेतों में डालिए। जानकी देवी के बताए इस नुस्खे के माध्यम से जैविक पद्धति से उम्दा कीटनाषी तैयार किया जा सकता है। इसका छीड़काव खेतों में महीने में चार बार करना चाहिए। इससे छीड़काव का लाभ आपको दिखने लगेगा। कीटनाषी के संबंध में यह भी बताया गया कि ख्ेातों में उगने वाले खरपतवार को नश्ट करने में भी यह कीटनाषी मददगार हो सकता है।

इस कीटनाषी के मारक क्षमता को समझने की कहानी बेहद दिलचस्प है, जानकी देवी के अनुसार, उन दिनों वे अपने मायके साठी (पष्चिम चम्पारण) में थीं। वहां घर के पास ही बैंगन, करेला, खीरा लगाया गया था। इनमें से कुछ सब्जियों पर कीड़े लग गए थे। इन्हीं कीड़ों को हटाने के लिए पास ही लगे गणपरास को उठाकर जैसे ही जानकी देवी ने उन कीड़ों को हटाने की कोषिष की। उस समय जिस-जिस कीड़े को गणपरास ने छुआ, वे वहीं चारों खाने चीत हो गया। इस तरह जानकी देवी उस गणपरास की ताकत को समझ पाई।
पुरस्कार के संबंध में जब उनसे बात हुई, उन्होंने बेहद भोलेपन से कहा- ‘पुरस्कार के लिए जब बृजकिषोर बाबू हमारे पास फाॅर्म भरवाने आए तो मुझे हंॅसी आ गई। विष्वास ही नहीं हुआ कि इस काम के लिए भी पुरस्कार मिल सकता है।’
सच्चाई यही है, हमारे गांवों में खोजी लोगों की कमी नहीं है, जरुरत है उनके काम को सही दिषा देने की। यदि हमारे समाज में बिखरे पारंपरिक ज्ञान को ही हम सहेज पाए या उसका दस्तावेजीकरण कर पाए तो इसे भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं कही जाएगी।