दि ग्रेट टूल किट और पर्यावरण के जयकारे

राजीव रंजन प्रसाद

ग्रेटा थनबर्ग का टूलकिट चर्चा में है लेकिन इसी के दृष्टिगत “वैश्विक नक्सलतंत्र” की नहीं पर्यावरण की चर्चा करनी आवश्यक है। भारत के भीतर होने वाली किसी भी अलगाववादी गतिविधि और उसके संचालन का मैकेनिज्म समझना है तो यही टूलकिट आजमायें, उदाहरण के लिये साझा किये गये दस्तावेज में किसान आंदोलन शब्द को काट कर नक्सलवाद जोड दें आपको देश-विदेश मेंउसके समर्थन में होने वाले कार्यक्रमों, अभियानों और गतिविधियों से कडियाँ जोडने मे मिनट नहीं लगेगा। बहरहाल टूलकिट और इसके भारतीय वामपंथी कलमखोरों की बात फिर कभी, ग्रेटा थनबर्ग से उसका ही प्रश्न पूछने की इच्छा है “हाउ डेयर यू?” 

ग्रेटा थनबर्ग के एन्वायरन्मेंटल एक्टिविज्म को एक सत्यकथा के आलोक में आपके सामने रखता हूँ। बात लगभग दस वर्ष पुरानी है। उन दिनों पर्यावरण के विषय “नेशनल एंवायरंवमेंट अपीलेट अथारिटी” के सम्मुख रखे जाते थे। अपने कार्य के सिलसिले में पर्यावरण कोर्ट निरंतर जाना होता था। वहीं उनसे पहली बार मुलाकात हुई थी। [ व्यक्ति का नाम इसलिये नहीं ले रहा हूँ क्योकि मैं एक लेखक हूँ मेरा काम घटना का विश्लेषण करना है उसे समाचार की तरह प्रस्तुत करना नहीं है।] शरीर पर कुर्ता, जिसमे पीछे की ओर पैबन्द लगा था। धोती मैली थी। उन्होने जो चश्मा पहना हुआ था वह एक हिस्से से फूटा हुआ था। मैं आदर से नतमस्तक हो गया। मुझे लगा कितना महान व्यक्ति है जिसे अपनी कोई परवाह नहीं; समाज के लिये जी रहा है। तकनीकी विषय पर उन्हे जिरह करने की अनुमति मिली थी और हल्के से झुकी कमर और दयनीय आवाज में “जन-जंगल-जमीन” पर एसी एसी दलीलें उन्होंने दीं कि यकीन मानिये दिल से मैं उनका भक्त हो गया था। वे कोर्ट आते थे तो साथ कुछ धोती-खादी वाले तथा कुछ ग्रामीण होते थे।

जज ने दलील सुनने के वाद विवादित स्थल को देखने की इच्छा जाहिर की। मेरा सौभाग्य कि कमीटी में मैं भी था और हम घटनास्थल पर पहुँचे। पास ही उन एक्टिविस्ट का मकान था। वहाँ पहुँच कर जैसे ही उन्हें मैने देखा मेरे बिम्ब धरे रह गये। पैंट-शर्ट पहनना कोई बुरी बात नहीं, नये फ्रेम का चश्मा भी पहना जा सकता है कोई बुराई नहीं। उनका मकान नदी के किनारे किसी रिसोर्ट की तरह था उसमें भी कोई बुराई नहीं।……लेकिन लेखक क्या करे उसे तो विषय कुरेदता है, इसलिये अपनी आदत के अनुसार शाम को जब पूरी कमेटी गेस्ट हाउस में थी मैं एक चौपाल में लगी मजलिश के बीच बैठ कर बात करने लगा। पता लगा कि जहाँ वह रिसोर्ट-नुमा मकान बना है वह जमीन एक विधवा की थी जिसे अपनी दबंगई तथा कानून की जानकारी के कारण उस एक्टिविस्ट ने अपने नाम करा लिया। विधवा और उसके बच्चे इतना सामर्थ तथा ज्ञान नहीं रखते थे कि कानून समझें या कानूनी लड़ाई लड़ सकें। सालों जमीन उसके कब्जे में रही फिर ‘एक्स-पार्टी निर्णय’ एक्टिविस्ट के पक्ष में हो गया तथा अब एक बढ़िया सा मकान नदी के किनारे….। अंत में बहुत मामूली “मुआवजा” दे कर विधवा से पिंड भी छुडा लिया था भाई साहब ने।…..। यहाँ आ कर मैने समझा कि एक्टिविज्म शब्द सुनते ही अभिभूत नहीं हो जाना चाहिये। हर इंकलाब-जिन्दाबाद चीखने वाले चेहरे के पीछे सही जुनून और सही मक्सद हो, कोई आवश्यक नहीं। इन दिनो बहुतायत के पीछे “हिडन एजेंडा” होते हैं। ये एजेंडा व्यक्ति को पूरा नाटकबाज बना देते हैं।

फूटा चश्मा, मैली धोती या पबंद लगा कुर्ता अगर आपको फैसिनेट करता है तो बुराई कुछ नहीं लेकिन सवाल इस वेषभूषा से उपर की चीज है। सवाल जब व्यक्ति से आगे निकलेंगे तभी जवाब मिलेंगे नहीं तो आपका जिन्दाबाद वैसा ही है जैसे निरमल बाबा के दरबार में जय-जय का घोष। इसी बात को एक अन्य उदाहरण से भी सामने रखता हूँ कि एक एक्टिविस्ट जो बहुधा घुटने तक खादी धोती और उपर भी आधी बाह का खादी कुर्ता पहना करते हैं तकनीकी विंदुओं पर एक पर्यावरण अदालत के  समक्ष बात रख रहे थे। विषय विशेषज्ञ ने बात बात दलील दी, साक्ष्य रखे, सिद्धांत बताये लेकिन मजाल है कि हॉर्न बजाने से पगुराती भैंस सडक से हट जाये? बाद में अदालत परिसर के बाहर मैंने एक्टिविस्ट महोदय का शैक्षणिक बैकग्राउंड पूछा तो जानकारी मिली हिंदी ऑनर्स ग्रेजुएट। ठीक है पर्यावरण ऐसा विषय है जिसमें नत्थू-खैरा भी विशेषज्ञ बन कर राय दे सकता है और ठस्स अपने ही तर्क पर खडा रह सकता है। यह विषय आसान लोकप्रियता की गायरंटी देता है।….इसीलिये मैं तो ग्रेटा थनबर्ग की निर्भीकता पर लहालोट था कि कोई साहस कर सकता है गंभीर पर्यावरण विषयों को वैशविक बना दे अब उसकी निर्लज्जता देख कर हतप्रभ हूँ। पर्यावरण अब एक टूल है किसी के लिये कोई संवेदनशील मसला नहीं।