बदल रहा है स्वास्थ का परिदृश्य और हो रहा सुधार

आशीष कुमार ‘अंशु’

इस बात को प्रधानमंत्री के राजनीतिक विरोधी भी मानते हैं कि उन्होंने देश के अंतिम जन तक सरकारी सुविधा पहुंचाई है। अब यह सुविधाएं सिर्फ कागजों पर नहीं पहुंच रही। जमीन पर उतर रहीं हैं।

जन धन खाता का उद्देश्य यही था कि पैसों को बिचौलियों के माध्यम से ना पहुंचाया जाए। जिसका परिणाम हुआ कि जनऔषधि केंद्र के माध्यम से आम आदमी दवा पर अपना 13 हजार करोड़ बचाने में सफल रहा और  आयुष्मान योजना से 70 हजार करोड़ की बचत की। गरीबों के बीच ये दोनों योजनाएं वरदान साबित हुई हैं। 

सरकार मरीजों को आसानी से जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए देश भर में जनऔषधि केंद्र खोल रही है। जिसके लिए देशभर में मार्च 2024 तक 10,000 प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों खोलने की योजना है। जन औषधि दवाइयां बाजार में मिलने वाली ब्रांडेड दवाईयों की तुलना में 50 से लेकर 90 फीसदी तक सस्ती हैं। इससे महंगी दवाइयों से लोगों को छुटकारा मिलता है नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 18 फीसदी लोग अपने अस्पताल का खर्च नहीं उठा पाते। इसलिए उन्हें या तो कर्ज लेना पड़ता है या फिर अपनी अचल संपत्ति बेचनी पड़ती है। ऐसे में देश भर में यदि जनऔषधि केन्द्रों का प्रसार होता है तो यह स्वास्थ सेवा में किसी क्रांति से कम नहीं  है।

आयुष्मान भारत योजना भी देश के सबसे पीछड़े वर्ग की भलाई के लिए है। यह मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है। इस योजना के अन्तर्गत लाभार्थियों को पांच लाख तक का स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाता है। इस स्वास्थ बीमा से गरीब परिवारों को बीमारी से लड़ने का ‘प्रतिरोधक हौसला’ मिला है। जब देश कोविड 19 की भयंकर चपेट में था। क्या गरीब और क्या अमीर, सभी कोविड 19 से पीड़ित थे। उसी दौरान सरकार ने इस योजना के अंतर्गत कोविड-19 का इलाज भी शामिल किया।

आयुष्मान भारत योजना के दायरे में आज भारत की लगभग आधी आबादी हैं। यह संख्या 50 करोड़ से भी अधिक लोगों की बैठती है। इस योजना के शुरू होने से लेकर अब तक तीन करोड़ से अधिक लोग इसका लाभ उठा चुके हैं। इस योजना के अन्तर्गत मरीजों को अस्पताल में मुफ्त इलाज मिला है। अगर ये योजना नहीं होती, गरीब परिवार से आने वाले लोगों को 70  हजार करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते। इन तीन करोड़ से अधिक लोगों के ईलाज पर आने वाला सारा खर्च भारत सरकार ने उठाया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 07 मार्च को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जन औषधि केंद्र के मालिकों और योजना के लाभार्थियों से ‘जन औषधि-जन उपयोगी’ विषय पर बातचीत की। जेनेरिक दवाओं के उपयोग और जन औषधि परियोजना के लाभों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए पूरे देश में जन औषधि सप्ताह मनाया गया। यूक्रेन से लौटे छात्रों से जब प्रधानमंत्री मिले तो देश में मेडिकल कॉलेज की कमी को लेकर कहा कि सरकार देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने पर काम कर रही है ताकि छात्र देश में ही मेडिकल शिक्षा पा सकें। अगले दस सालों में केन्द्र सरकार ने हर एक जिले में एक अस्पताल खोलने का लक्ष्य रखा। निश्चित तौर इससे देश में चिकित्सा शिक्षा में सीटों की वृद्धी होगी। 

सरकार यदि चाहे तो यह भी हो सकता है कि जहां स्वास्थ व्यवस्था की बड़ी जिम्मेवारी बिना डिग्री वाले डॉक्टरों के कंधों पर है। वहां सरकार प्रशिक्षण देकर गांव और जनजातीय क्षेत्रों में ‘बिना डिग्री वाले डॉक्टरों’ को तैनात करती है तो इससे उन क्षेत्रों में स्वास्थ सुविधा पहुंच सकती है, जहां महंगी पढ़ाई करने वाले डॉक्टर जाने को तैयार नहीं होते। वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस बात का भरोसा दिया है कि देश में मेडिकल शिक्षा में सीट बढ़ेगी और शिक्षा सस्ती भी होगी। कुछ दिन पहले ही सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है जिसका बड़ा लाभ गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को मिलेगा। सरकार ने तय किया है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में आधी सीटों पर सरकारी मेडिकल कॉलेज के बराबर ही फीस लगेगी।

वैसे इन निर्णयों के फलीभूत होने में समय लगेगा। समय रहते यदि हम गांव और आदिवासी क्षेत्रों की स्वास्थ व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करना चाहते हैं तो वहां पहले से काम कर रहे झोला छाप डाॅक्टरों के प्रशिक्षण की व्यवस्था पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। वे देश की प्राथमिक स्वास्थ व्यवस्था को सुदृढ़ करने में मजबूत स्तम्भ साबित हो सकते हैं।

चिकित्सा शिक्षा में होने वाले खर्च को जहां नियंत्रित करने के लिए सरकार प्रयासरत है, वहीं साथ—साथ वह चिकित्सा खर्च को कम करके स्वास्थ सुविधा को आम आदमी के लिए सुगम बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। इसके लिए जन-औषधि केंद्र के विस्तार पर विचार किया जा रहा है। दवा का पर्चा हाथ में आने के बाद लोगों के मन में पहली आशंका यही होती थी कि, पता नहीं कितना पैसा दवा खरीदने में खर्च होगा? जन-औषधि केंद्र  ने वो चिंता कम की है। आज देश में साढ़े आठ हजार से ज्यादा जन-औषधि केंद्र खुले हैं। ये केंद्र अब केवल सरकारी स्टोर नहीं, बल्कि समाधान केंद्र बन रहे हैं। सरकार ने कैंसर, टीबी, डायबिटीज, हृदयरोग जैसी बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी 800 से ज्यादा दवाइयों की कीमत को भी नियंत्रित किया है। सरकार ने ये भी सुनिश्चित किया है कि स्टंट लगाने और घुटना प्रत्यारोपण की कीमत भी नियंत्रित रहे। आज देश में 8500 से ज्यादा जन औषधि केंद्र खुले हैं। जब मोदी सरकार 2014 में सत्ता में आई थी, देश में सिर्फ एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान हुआ करता था। आज देश में 22 ऐसे संस्थान हैं।

गांव की महिलाओं के लिए माहवारी के समय सेनेटरी नेपकीन की जरूरत को स्वच्छता और साफ सफाई के लिहाज से भी समझा जा सकता है। जहां परिवार में पहनने को कपड़ा पूरा ना पड़ता हो, ऐसे परिवारों में सेनेटरी नेपकीन के ना होने पर मिट्टी और राख का इस्तेमाल आज भी गांवों में आम बात है। ऐसे परिवारों के लिए  01 रुपए में केन्द्रों पर मिलने वाला सेनेटरी नेपकीन किसी वरदान से कम नहीं है। इन केन्द्रों के माध्यम से 21 करोड़ से ज्यादा सेनेटरी नेपकीन की बिक्री, दिखाती है कि कितनी बड़ी संख्या में महिलाओं का जीवन आसान हो रहा है।

इस वित्तीय वर्ष में जन औषधि केंद्रों के माध्यम से 800 करोड़ रुपए से ज्यादा की दवाएं बिकी हैं। इसी साल की बात करें तो जन औषधि केंद्रों की वहज से गरीब परिवारों और मध्यम वर्ग के परिवारों में करीब 5,000 करोड़ रुपए की बचत हुई है। केन्द्र सरकार के जन औषधि केंद्रों के माध्यम से 13,000 करोड़ रुपए की बचत यहां आने वाले लोगों की हुई है।

नीति आयोग ने ‘भारत में वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल की पुनर्कल्पना’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका मिलकर ब्रिक्स देश होते हैं। इन सभी देशों का तुलनात्मक अध्ययन जब आयोग ने किया तो पाया कि भारत का स्वास्थ्य देखभाल पर शेष देशों की तुलना में सबसे कम खर्च है

आम आदमी के लिये समान रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करने के लिये अस्पताल में बिस्तरों की संख्या में कम-से-कम 30 प्रतिशत वृद्धि किये जाने की जरूरत है। यह बात नीति आयोग की रिपोर्ट में आई है कि  सभी तक अस्पताल की स्वास्थ सुविधाएं पहुंचे इसके लिए बिस्तरों की संख्या मे कम से कम 30 फीसदी की वृद्धि किए जाने की जरूरत है।

बहरहाल सरकार आने वाले समय में इन जरूरतों को पूरा करे और स्वास्थ के पूरे परिदृश्य में सुधार लाने की पहल करे। यही समय की मांग है।

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